Friday, 24 February 2017

What is 'Risk Capital'

Risk capital consists of investment funds allocated to speculative activity and refers to the funds used for high-risk, high-reward investments such as junior mining or emerging biotechnology stocks. Such capital can either earn spectacular returns over a period of time, or it may dwindle to a fraction of the initial amount invested if several ventures prove unsuccessful, so diversification is key for successful investment of risk capital. In the context of venture capital, risk capital may also refer to funds invested in a promising startup.

BREAKING DOWN 'Risk Capital'

The more risk averse the investor, the lower the proportion of risk capital allocated in the total portfolio should be. While young investors, because of their lengthy investment horizons, can have a very significant proportion of risk capital in their portfolios, retirees may not be comfortable with a high proportion of risk capital.
Risk capital should be funds that are expendable in exchange for the opportunity to generate outsized gains. It is money that can afford to be lost. Investors must be willing to lose some or all of their risk capital. It should account for 10% or less of an investor's portfolio equity and should be offset with more stable diversified investments. Speculative investing should be segmented to the early years of investing and cordoned off as retirement age approaches. Investment objectives may also change as participants start to rely more on fixed-income sources.

Uses of Risk Capital

Risk capital is commonly utilized with speculative investments and activities. If the risk is more than proportionate to the reward, then risk capital may be considered. Investors and traders should try to accurately assess the risk prior to any investment or trade. Risk capital is often used for speculative investments in penny stocks, angel investing, lending, private equity, initial public offerings, real estate, day trading and swing trading of stocks, futures, options and commodities.


vitta ke strot

एक व्यवसाय उद्यम के लगभग प्रत्येक व्यवसाय चरण में वित्त की आवश्यकता होती है। एमएसएमई अपने परिचालन और साथ ही साथ विस्तार व संवृद्धि के लिए पर्याप्त वित्त की व्यवस्था करने में अक्सर कठिनाई का सामना करते हैं। ये उद्यम विभिन्न विधियों से वित्त जुटा सकते हैं। नीचे कुछ उपाय दिए गए हैं, जिनसे दीर्घावधि एवं अल्पावधि पूँजी जुटाई जा सकती है। 
दीर्घावधि पूँजी के स्रोत
लाभ का पुनर्निवेश
लाभप्रद कंपनियाँ सामान्यत: अपने लाभ की पूरी राशि लाभांश के रूप में नहीं बाँटते हैं, बल्कि कुछ अंश आरक्षित निधि में अंतरित कर देते हैं। इसे लाभ का पुनर्निवेश माना जा सकता है। चूँकि लाभ की ऐसी प्रतिधारित राशि कंपनी के शेयरधारकों की होती है, अत: उसे स्वामित्व पूँजी का हिस्सा माना जाता है। लाभ का प्रतिधारण एक प्रकार से व्यवसाय का स्व-वित्तपोषण है। लाभ प्रतिधारित करते जाने से कुछ वर्षों के दौरान अच्छी आरक्षित निधि बन जाती है और कंपनी इसे निम्नलिखित प्रयोजनों के लिए उपयोग कर सकती है :
  • उपक्रम का विस्तार
  • पुरानी आस्तियों को प्रतिस्थापित करना और आधुनिकीकरण
  • स्थायी या विशेष कार्यशील पूँजी आवश्यकताओं की पूर्ति
  • पुराने ऋणों का मोचन
कंपनी को वित्त के इस स्रोत के निम्नलिखित लाभ हैं :
  • इससे वित्त के बाहरी स्रोतों पर निर्भरता कम हो जाती है।
  • इससे कंपनी की ऋण-सुपात्रता में वृद्धि होती है।
  • इसके कारण कंपनी कठिन परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम होती है।
  • इससे कंपनी की लाभांश नीति को स्थिरता मिलती है।

वाणिज्य बैंकों से ऋण
कंपनियाँ संपत्तियों और आस्तियों की प्रतिभूति के प्रति वाणिज्य बैंकों से मध्यम अवधि के सावधि ऋण प्राप्त कर सकती हैं। आस्तियों के आधुनिकीकरण और पुनरुद्धार के लिए अपेक्षित निधियाँ बैंकों से उधार ली जा सकती हैं। आस्तियों के बंधक को छोड़कर, वित्तीयन की इस विधि के लिए किसी अन्य विधिक औपचारिकता की आवश्यकता नहीं होती है।

भारत में वाणिज्य बैंकों की विभिन्न ऋण योजनाओं का विवरण प्राप्त करने के लिए, यहाँ क्लिक करें।
भारत में वाणिज्य बैंकों की विभिन्न फ़ॉर्मों का विवरण प्राप्त करने के लिए, यहाँ क्लिक करें।

वित्तीय संस्थाओं से ऋण
कंपनियाँ वित्तीय संस्थाओं, जैसे – औद्योगिक वित्त निगम लि., राज्य स्तरीय औद्योगिक विकास निगम, आदि से दीर्घावधि एवं मध्यम अवधि के सावधि ऋण प्राप्त कर सकती हैं। ये वित्तीय संस्थाएँ अनुमोदित योजनाओं और परियोजनाओं के के प्रति अधिकतम 25 वर्ष के लिए ऋण उपलब्ध कराती हैं। मंजूरी के ले सहमत ऋण के प्रति कंपनी की संपत्ति के बंधक या स्टॉक, शेयर, स्वर्ण, आदि के समनुदेशन के माध्यम से प्रतिभूति दी जानी अनिवार्य होती है।  

भारत में प्रमुख वित्तीय संस्थाओं की विभिन्न ऋण योजनाओं का विवरण प्राप्त करने के लिए, यहाँ क्लिक करें।

सार्वजनिक जमाराशियाँ
कंपनियाँ अक्सर अपने शेयरधारकों, कर्मचारियों और आम जनता से उनकी बचतराशियाँ कंपनी के पास जमा करने का अनुरोध करती हैं। कंपनी अधिनियम में यह अनुमति है कि ऐसी जमाराशियाँ तीन वर्ष तक की अवधि के लिए प्राप्त की जा सकती है। कंपनियाँ अपनी मध्यम अवधि और अल्पावधि वित्तीय आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए सार्वजनिक जमाराशियाँ जुटाई जा सकती है। सार्वजनिक जमाराशियों की बढ़ती लोकप्रियता निम्नलिखित के कारण है :
  • कंपनियों को इन जमाराशियों पर जो ब्याज देना पड़ता है, वह बैंक ऋण पर दी जाने वाली ब्याजदर से कम होता है।
  • यह बैंकों की तुलना में निधि संग्रह का सरल तरीका है, विशेष रूप से ऋम मंदी की अवधि में।
  • ये अप्रतिभूत होते हैं।
वाणिज्य बैंकों के विपरीत, कंपनी को ऋण प्राप्त करने के लिए अपनी ऋण-सुपात्रता सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती है।

जोखिम पूँजी
जोखिम पूँजी पूँजी के उस प्रावधान को दर्शाती है, जिसमें प्रदाता उद्यमी का जोखिम बोझ कम करता है, और बदले में, उत्पादक गतिविधि में शामिल समग्र जोखिम का कुछ हिस्सा स्वयं वहन करता है। भारत में व्यापक रूप से प्रयुक्त परिभाषा के अनुसार “जोखिम पूँजी” शब्दपद में ईक्विटी और साथ ही साथ मेज़नीन /अर्द्ध-ईक्विटी वित्तीय उत्पाद, जिसमें ऋण और ईक्विटी दोनों के गुण होते हैं, शामिल होते हैं। जोखिम पूँजी न केवल नवारंभ एवं नवोन्मेषी /तेजी से वृद्धि करने वाली इकाइयों के लिए महत्त्वपूर्ण लिखत है, बल्कि उन कंपनियों के लिए भी महत्त्वपूर्ण है, जो संवृद्धि करना चाहती है। जोखिम पूँजी  प्रवर्तक अंशदान को प्रतिस्थापित करती है, जिससे उद्यमी द्वारा लाई जाने वाली पूँजी में कमी होती है। ऐसे मामलों में, जोखिम पूँजी एमएसएमई के लिए पूँजी जुटाने के सर्वाधिक व्यवहार्य विकल्पों में से एक है। एमएसएमई के लिए जोखिम पूँजी जुटाने के उपलब्ध प्रमुख विकल्पों में उद्यम पूँजी, ऐन्जल निवेश तथा सार्वजनिक सूचीबद्धता शामिल हैं।
विभिन्न जोखिम पूँजी विकल्पों पर विवरण प्राप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करें।

शेयर जारी करना
यह सर्वाधिक मह्त्त्वपूर्ण विधि है। शेयरधारक की देयता शेयर के अंकित मूल्य तक सीमित होती है और वह भी सरलता से हस्तांतरणीय होती है। एक निजी कंपनी अपनी शेयर पूँजी के प्रति अंशदान के लिए आम जनता को आमंत्रित नहीं कर सकती है और उसके शेयर भी मुक्त रूप से हस्तांतरणीय नहीं होते हैं। किंतु पब्लिक लिमिटेड कंपनी के लिए, ऐसे कोई प्रतिबंध नहीं हैं। शेयर दो प्रकार के होते हैं :-
  • ईक्विटी शेयर : इन शेयरों पर लाभांश की दर उपलब्ध लाभ और निदेशकों को प्राप्त विवेकाधिकार पर निर्भर करती है। अत: कंपनी पर कोई निर्धारित बोझ नहीं होता है। प्रत्येक शेयर को एक मत (वोट) का अधिकार होता है।
  • अधिमान शेयर : इन शेयरों पर एक नियत दर पर देय होता है और वह केवल उस स्थिति में देय होता है, जब लाभ कमाया गया हो। अत: कंपनी की वित्तीय स्थिति पर कोई अनिवार्य बोझ नहीं होता है। इन शेयरों को मत (वोट) अधिकार नहीं होता है।

एमएसएमई उद्यमों की सार्वजनिक सूचीबद्धता के बारे में विवरण जानने के लिए, यहाँ क्लिक करें।

डिबेन्चर जारी करना
कंपनियों को सामान्यत: डिबेन्चर जारी कर उधार और ऋण लेने की शक्तियाँ प्राप्त होती है।  डिबेन्चरों पर अदा की जाने वाली ब्याजदर उसे जारी करने के समय ही स्थिर होती है और वह कंपनी की संपत्ति एवं आस्तियों पर प्रभार के माध्यम से प्रतिभूत होती है, जो भुगतान के लिए आवश्यक सुरक्षा प्राप्त उपलब्ध कराती है। कंपनी को ब्याज का भुगतान करना होता है, चाहे लाभ हो या न हो। डिबेन्चर अधिकतर दीर्घावधि आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जारी किए जाते हैं और इन्हें कोई मताधिकार नहीं होता है। 
अल्पावधि सावधि पूँजी के स्रोत
व्यापार उधार
कंपनियाँ विभिन्न आपूर्तिकर्ताओं से उधार पर कच्चा माल, घटक, भांडार और पुर्जे खरीदती हैं। सामान्यत: आपूर्तिकर्ता 3 से 6 माह की अवधि के लिए उधार मंजूर करते हैं और इस प्रकार कंपनी को अल्पावधि वित्त प्रदान करते हैं। इस प्रकार का वित्त उपलब्ध होना व्यवसाय की मात्रा से जुड़ा होता है। जब सामानों का उत्पादन और बिक्री बढ़ती है, तो स्वत: ही खरीदारी की मात्रा बढ़ जाती है और अधिक व्यापार उधार उपलब्ध होता है। 

फ़ैक्टरिंग
उधार बिक्री के कारण ग्राहक से किसी कंपनी को देय राशियाँ सामान्यत: अनुमत उधार की अवधि के दौरान अर्थात् देनदार से देयराशियाँ वसूल किए जाने तक, बकाया रहती हैं। बही ऋण किसी बैंक को सौंप दिए जाते हैं और बैंक से अग्रिम रूप में नक़द राशि प्राप्त कर ली जाती है। इस प्रकार, कंपनी से विनिर्दिष्ट प्रभार का भुगतान किए जाने पर देनदार से शेष राशि वसूल किए जाने का दायित्व बैंक अधिगृहीत कर लेता है। अल्पावधि जुटाने की यह विधि फ़ैक्टरिंग कहलाती है। इस प्रयोजन के लिए देय प्रभारों को निधियाँ जुटाने की लागत मानी जाता है। 

विनिमय बिल की भुनाई
अल्पावधि वित्त जुटाने के लिए कंपनियाँ इस विधि का व्यापक रूप से उपयोग करती हैं। जब सामान उधार पर बेचा जाता है, तो सामान्यत: सामान के क्रेताओं की स्वीकृति के लिए विनिमय बिल तैयार के किए जाते हैं। ऐसे बिलों को परिपक्वता तिथि तक धारित रखने के बजाय कंपनियाँ बैंक प्रभार (जिसे बैंक का बट्टा कहा जाता है) का भुगतान कर उन्हें वाणिज्य बैंकों से भुना सकती है। बैंक जिस दर पर भुनाई करते हैं, उसका निर्धारण समय-समय पर रिज़र्व बैंक करता है। भुनाई करते समय बिल की राशि में से भुनाई की राशि काट ली जाती है। इस विधि से वित्त जुटाने की लागत वह होती है, जो बैंक बट्टे के रूप में लेते हैं। 

एनटीआरईईएस – ई-भुनाई के लिए व्यापारगत प्राप्यराशि इंजन
आपूर्तिकर्ताओं, विशेष रूप से एमएसएमई के खातों की प्राप्यराशियों की ई-भुनाई के लिए एक इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफ़ॉर्म की स्थापना के लिए सिडबी और एनएसई के बीच सहयोग की सहमति हुई है। प्लेटफ़ॉर्म का नाम एनटीआरईईएस है, जो क़ाग़ज-आधारित भौतिक कार्यविधि के स्थान पर ई-व्यापार स्थापित करेगा, जिससे बिल भुनाई के संव्यवहार किफ़ायती, शीघ्रतापूर्ण और अधिक पारदर्शी हो जाएँगे। यह गतिविधि आपूर्तिकर्ताओं विशेष रूप से एमएसएमई की चलनिधि समस्या के प्रभावी और दक्षतापूर्ण समाधान के लिए तैयार किया गया है और इसलिए इसके संव्यवहार इसे स्वपोषित बनाए रखते हैं।   

एमएसएमई आज जिन प्रमुख चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, उनमें एक है उपयुक्त लागत पर पूँजी आवश्यकताओं की पूर्ति। एनटीआरईईएस एमएसएमई की इन चुनौतियों का समाधान करने वाला एक अनुपम एवं उत्साहवर्द्धक प्लेटफ़ॉर्म है।
एनटीआरईईएस के बारे में अधिक जानने के लिए
यहाँ क्लिक करें।
बैंक ओवरड्रॉफ्ट एवं नक़द उधार
अल्पावधि वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यह एक आम विधि है, जो कंपनियाँ उपयोग करती हैं। नक़द उधार एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके अधीन वाणिज्य बैंक एक निर्दिष्ट सीमा के अंदर समय-समय पर अग्रिम रूप से राशियाँ आहरित किए जाने की अनुमति देते हैं। यह सुविधा भंडार में उपलब्ध सामान-भांडार, या दूसरे हस्ताक्षर के साथ वचनपत्र, या विपणन-योग्य अन्य लिखतों, जैसे सरकारी बांड की प्रतिभूति के प्रति दी जाती है। ओवरड्रॉफ़्ट बैंक के साथ एक अस्थायी व्यवस्था है, जिसमें कंपनी को एक निश्चित सीमा तक बैंक में स्थित अपने चालू जमाखाते से  अग्रिम रूपी अधिक राशि आहरित करने की अनुमति हौती है। ओवरड्रॉफ़्ट सुविधा प्रतिभूतियों के प्रति भी दी जाती है। नक़द उधार और ओवरड्रॉफ़्ट पर लगाई जाने वाली ब्याजदर बैंक जमाराशियों पर लगाए जाने वाली दर की अपेक्षा काफी अधिक होती है। 

भारत में विभिन्न वाणिज्य एवं विकास बैंकों की विभिन्न ऋण योजनाओं का विवरण जानने के लिए, यहाँ क्लिक करें।

Advantages and Disadvantages of Leasing

Leasing is becoming a preferred solution to resolve fixed asset requirements vs. purchasing the asset. While evaluating this investment, it is essential for the owner of the capital to understand whether leasing would yield better returns on capital or not. Let us have a look at Advantages and Disadvantages of Leasing:
ADVANTAGES OF LEASING

BALANCED CASH OUTFLOW

The biggest advantage of leasing is that cash outflow or payments related to leasing are spread out over several years, hence saving the burden of one-time significant cash payment. This helps a business to maintain a steady cash-flow profile.

QUALITY ASSETS

While leasing an asset, the ownership of the asset still lies with the lessor whereas the lessee just pays the rental expense. Given this agreement, it becomes plausible for a business to invest in good quality assets which might look unaffordable or expensive otherwise.

BETTER USAGE OF CAPITAL

Given that a company chooses to lease over investing in an asset by purchasing, it releases capital for the business to fund its other capital needs or to save money for a better capital investment decision.

TAX BENEFIT

Leasing expense or lease payments are considered as operating expenses, and hence, of interest, are tax deductible.

OFF-BALANCE SHEET DEBT

Although lease expenses get the same treatment as that of interest expense, the lease itself is treated differently from debt. Leasing is classified as an off-balance sheet debt and doesn’t appear on company’s balance sheet.

BETTER PLANNING

Lease expenses usually remain constant for over the asset’s life or lease tenor, or grow in line with inflation. This helps in planning expense or cash outflow when undertaking a budgeting exercise.

LOW CAPITAL EXPENDITURE

Leasing is an ideal option for a newly set-up business given that it means lower initial cost and lower CapEx requirements.

NO RISK OF OBSOLESCENCE

For businesses operating in the sector, where there is a high risk of technology becoming obsolete, leasing yields great returns and saves the business from the risk of investing in a technology that might soon become out-dated. For example, it is ideal for the technology business.

TERMINATION RIGHTS

At the end of the leasing period, the lessee holds the right to buy the property and terminate the leasing contract, this providing flexibility to business.

DISADVANTAGES OF LEASING

LEASE EXPENSES

Lease payments are treated as expenses rather than as equity payments towards an asset.

LIMITED FINANCIAL BENEFITS

If paying lease payments towards a land, the business cannot benefit from any appreciation in the value of the land. The long-term lease agreement also remains a burden on the business as the agreement is locked and the expenses for several years are fixed. In a case when the use of asset does not serve the requirement after some years, lease payments become a burden.

REDUCED RETURN FOR EQUITY HOLDERS

Given that lease expenses reduce the net income without any appreciation in value, it means limited returns or reduced returns for an equity shareholder. In such case, the objective of wealth maximization for shareholders is not achieved.

DEBT

Although lease doesn’t appear on the balance sheet of a company, investors still consider long-term lease as debt and adjust their valuation of a business to include leases.

LIMITED ACCESS OF OTHER LOANS

Given that investors treat long-term leases as debt, it might become difficult for a business to tap capital markets and raise further loans or other forms of debt from the market.

PROCESSING AND DOCUMENTATION

Overall, to enter into a lease agreement is a complex process and requires thorough documentation and proper examination of an asset being leased.
NO OWNERSHIP
At the end of the leasing period, the lessee doesn’t end up becoming the owner of the asset though quite a good sum of payment is being done over the years towards the asset.
MAINTENANCE OF THE ASSET
The lessee remains responsible for the maintenance and proper operation of the asset being leased.

LIMITED TAX BENEFIT

For a new start-up, the tax expense is likely to be minimal. In these circumstances, there is no added tax advantage that can be derived from leasing expenses

difference between angel investor and venture capital

Points of Difference between Venture Capitals and Angel Investors

1.    What they are:

Angel Investors:

Are the High Net-Worth Individuals (HNIs), who generally forms closed groups called angel network and collectively invests in a venture. Angel network helps them to make more informed investment and reduce the risk of an individual as pool of investors are investing small amount in multiple companies.. They do it in exchange of equity in the startup. Examples of Angel/Angel Networks active in India are- Mumbai Angels, The Chennai Angels, Indian Angel Network, Hyderabad Angels, The indus Entrepreneurs.

Venture Capital Firm:

These are the mostly the Limited Liability Partnership firms/funds, which raises fund from different investors. As against Angel investment where the decision of investment rests with the individual, a Fund/ Portfolio Manager in Venture Capital firms is the one who hunts for promising deals to get the best returns for their investor’s money. Example of VC/PE active in India are- Kalaari capital, Nexus Venture Partners, Accel Partners, Tiger Global Management, Helion Venture Partners etc.

2.    Whose Money is invested

This is the main parameter what differentiates an angel investor. The “fund”- Angels invests in businesses in their own capacity

Angel Investors –

Angel investors, invests their own money in the ventures after doing enough due diligence on their part. They often forms groups and pool their money to invest together. But this requires the domain know-how and also investors have to invest their time to hunt the deals, meet with the founders, documentation of investment, monitoring on the use of funds by the startup.

Venture Capital Firms-

This is an investment firm, which raises money from various HNIs/ investors and invest it on their behalf in various startups. VCs have fund/ portfolio managers to manage their investment portfolio. They have a dedicated and skilled team, which looks out for promising opportunities, and get the deal closed.

3.    Who Makes the Decision

Angel Investors

Since the money involved in this case is their own, due diligence is made by the investors. Since angel investors invests in the very initial stages of the company, there are very few numbers available to convince the investors, most of the deals are made on logical hunches- like the scalability of the idea, Product Market Match, Founding Team. Read What investors look for in a business before investing” for details.

Venture Capital Firms

As against angel investors in case of VCs the portfolio manager hunts for the most profitable deals for the investors who have contributed to the fund. On an average, a fund is raised for 10 years. So, fund manager is even more diligent than the angel investor in choosing the right deal.

4.    Stage of Investment

Startups are a risky asset, 90% of the companies, which are born dies. Only 1% gets funded and Out of 10 funded startups, 7 companies die. That means there are very high chances of your money being wasted. That means the initial stages are the most crucial ones and involves highest risk.
Majorly there are four stage of any startup
  1. Seed Stage
  2. Early Stage
  3. Growth Stage
  4. Expansion Stage

Angel Investors

Angel investors are the high-risk takers. They can bet their money on the idea as well if they feel the potential in it. Now, since they are taking much risk than a VC (who invests in later stages) they expect greater chunk of your equity and high returns.

Venture Capital Firms

Venture Capitals generally invests in Growth stage (Series A) and forward, when the company has some proven numbers. As compared to angels they are less risk takers.

5. Size of Investment

Angel Investors

Angels generally invests in the Seed Stage or the Early Stage, the average amount of deal for both being $ 0.7 million (approx. Rs. 4.2 crore) and $ 2 million (Rs. 12 crore) respectively, for the year 2015.

Venture Capital Firms

Since venture capital firms majorly (95%) invests in Growth Stage or Expansion Stage, the average amount of deal was $ 2 million (Rs. 34 crore) and $ 36 million (Rs. 216 crore)

6. Their Support System

Angel Investors

Since the performance of the company entirely decides the fate of the investor’s money, angels do guide the startups (sometimes felt a poked nose) in all the matters. A member from the angel investor group takes the seat in the board of members as well, till the Venture Capital Firm invests unless angel is still the significant contributor.

Venture Capital Firms

Venture Capitals are more professional in their approach and guidance. With their alliance comes a huge support system of high profile contacts, experience etc.

7.    What they take in return

Both angel and VCs demand 20-30% of the pie. Keep in mind that 20% of an angel is a smaller amount as compared to 20% of VC because the the equity is divided on the post valuation basis.

Saturday, 18 February 2017

Diff b/w allocation and absorption

The major difference between allocation and apportionment methods are that allocation is used when the overhead can be directly related to one department and cost center, and apportionment is used when the overhead arises from a number of departments.



Allocation: Overhead Costs which are directly identifiable to a cost center are directly allocated to that cost centre.

 Apportionment: Overheads which are not directly identifiable are first charged to general overhead and then those general overheads are apportioned on appropriate bases i.e. area, machine hour etc, then service department apportioned cost are apportioned among production department and finally the production overhead both allocated and apportioned are absorbed using absorbing rate.

apportionment of OH

A manufacturing company has two producing departments, Department A and Depart­ment B, and three service departments—Stores, Power house and Repair shop.
From the following information prepare a manufacturing expense budget and calculate overhead recovery rates for the two production departments as percentages of direct labour :
Method of Apportionment of Overheads with Problem 8
Depreciation calculated as a% of original cost:
Solution
Problem 5:
You are supplied with the following information and required to work out the production hour rate of recovery of overhead for departments A, B and C:
Method of Apportionment of Overheads with Problem 9
Method of Apportionment of Overheads with Problem 9

allocation and absorption of OH

The following points highlight the top two methods of apportionment of overheads. The methods are: 1. Primary Distribution of Overhead 2. Secondary Distribution.

Apportionment of Overhead: Method # 1.

Primary Distribution of Overhead:
Primary distribution involves apportionment or allocation of overhead to all departments in a factory on logical and rational basis. This process of apportionment is also known as departmentalisation of overhead. It is to be carefully noted that at the time of making primary distribution, the distinction between production and service departments is ignored.
Following points should be considered for primary distribution of items of overheads:
(i) Basis for distribution should be equitable and practicable;
(ii) Method adopted for distribution should not be time-consuming;
(iii) Overhead expenses should be distributed among different departments on the basis of benefits received by departments;
For the purpose of primary distribution, a departmental distribution summary is prepared in the following way:
Basis of Apportionment of Factory Overhead:
Expenses:
1. Lighting, heating, rent, rates and taxes, depreciation on building, repair cost of building, caretaking etc.
2. Insurance on Plant and Machinery, Building; Depreciation on Plant and Machinery; Maintenance of Plant and Machinery.
3. Insurance on tools and fixtures, power, repairs and maintenance cost etc.
4. Canteen subsidy or expenses, pension, medical expenses, personnel department expenses, cost of recreational facilities. Expenses of wage department
5. Cost of supervision.
Base:
1. Floor area occupied by each department. Light points for lighting.
2. Capital values of Assets.
3. Direct Labour hours or Machinery hours.
4. Number of employees or workers.
5. Time devoted.

Apportionment of Overhead: Method # 2.

Secondary Distribution:
In a factory a product does not pass through Service department (S), but service department renders service to production departments for carrying on production function. It is, therefore, logical that the product cost should bear the equitable share of cost of service department. Under this backdrop, the second step is to distribute the total cost of service departments among the production departments.
The process of redistributing the cost of service departments among production departments is known as secondary distribution. Here, the cost of service department means the apportioned overheads plus direct materials plus direct labour and direct expenses of concerned service department.
Bases for Secondary Distribution:
Service Department Costs:
(i) Employment department
(ii) Maintenance department
(iii) Purchase department
(iv) Store keeping
(v) Canteen, welfare and recreation
Basis of Redistribution:
(i) Rate of labour-turnover or number of employees.
(ii) Hours worked for each department.
(iii) No. of purchase orders or value of materials purchased.
(iv) No. of requisitions.
(v) No. of employees of each department.
Swill Co. Ltd. has three production departments and two service departments. From the following information show the distribution of service departments cost under the repeated distribution method:
Method of Apportionment of Overheads with Problem 5
Solution